मृत्यु भोज
आज मेरे मित्र के घर मृतक भोज मे जाकर जो दुख हुआ और समाज की रीत पर जो विचार आया वह विचारणीय पंक्तियाँ प्रेषित है अपना विचार जरूर देवें....
किसी के माथ की बिंदिया लूटी, लूटी सिंदूर की लाली।
नाक से लूट गई साज की नथनी,लूटी कान की बाली।
अंतस की दुखड़ा को उनके,थोड़ा सा तू सोच,
उनके घर बैठकर तुम, क्या करोगे मृत्यु भोज।
किसी के सर पे हाथ न रहा,किसी के अब नाथ न रहा।
कन्यादान दान करने को अब वो पिता का साथ न रहा।
लालन-पालन जिम्मेदारियो का माँ पर हो गई बोझ,
उनके घर बैठकर तुम, क्या करोगे मृत्यु भोज।
बूढ़ी माँ बैठ आंगन मे पुत्र शोक मे बिलख रही।
मै जीवित बेटे न रहा आत्मा उनकी कलप रही।
बहती दुखड़ा की नीर धारा,उन आँखो को बस पोछ,
उनके घर बैठकर तुम, क्या करोगे मृत्यु भोज।
दुख मे जिमाये जात न भोजन,परिजन की पंगत लगवाये।
ये कैसी समाजिक रीति पवन,पंगत बैठ जीभ आनंद पाये।
कुरीति को त्यागो बन्धुओं,जो सु-रीति हो वह खोज,
उनके घर बैठकर तुम, क्या करोगे मृत्यु भोज।
पवन नेताम 'श्रीबासु'
सिल्हाटी, कबीरधाम(छ.ग.)
...2020
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