विष्णु सक्सेना
प्यास बुझ जाये तो शबनम खरीद सकता हूँ।
जख्म मिल जाये तो मरहम खरीद सकता हूँ।
ये मानता हू मै दौलत नही कमा पाया,
मगर तुम्हारा हर एक गम खरीद सकता हूँ।
सोचता था मै तुम गिर के सम्हल जाओगे।
रौशनी बनके अंधेरों को निगल जाओगे।
न तो मौसम थे न हालात न तारिख न दिन
किसे पता था कि तुम ऐसे बदल जाओगे।
तू जो ख्वाबों मे भी आ जाये तो मेला कर दे।
गम के मरूथल मे भी बरसात का रेला कर दे।
याद वो है ही नही आये जोतन्हाई मे,
तेरी याद आये तो मेले मे भी अकेला कर दे।
जब भी कहते हो आप हमसे कि अब चलते है।
हमारी आँख से आंसू नही सम्हलते है।
अब न कहना कि संग दिल कभी नही रोते,
जितने दरिया है पहाड़ो से ही निकलते है।
मेरा मुक्तक मेरे लहजे मे गालियां होगा।
दर्द उसने मेरी तरह दबा लिया होगा।
उसकी तलखी मे हुआ कैसे तरन्नुम पैदा,
उसने गुस्से मे मेरा खत चबा लिया होगा।
हमे कुछ पता नहीं है हम क्यों बहक रहे है।
राते सुलग रही है दिन भी दहक रहे है।
जब है तुमको देखा बस इतना जानते है,
तुम भी महक रही हो हम भी महक रहे है।
बरसात भी नही पर बादल गरज रहे है।
सुलझी हुई है जुल्फें और हम उलझ रहे है।
मदमस्त एक भँवरा क्या चाहता कली से
तुम भी समझ रहे हो हम भी समझ रहे है।
अब भी हसीन सपने आँखो मे पल रहे है।
पल्के है बंद फिर भी आँसू निकल रहे है।
नींदे कहा से आये बिस्तर पे करवटे ही
वहा तुम बदल रहे हो यहां हम बदल रहे है।
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