वक्त बेवक्त इशारा न कर
वक़्त बेवक़्त छत से इशारा न कर ।
हो चुके हैं पराये पुकारा न कर ।
सूरज तेरे दीदार मे नही निकलेगा,
बेवफा चेहरा अब सवारा न कर।
जिन्दगी हो गई किसी और के नाम,
मेरे इंतज़ार मे समय गुजारा न कर।
खत्म हो गई महफिल अब हमारी,
मुद्दत की बातों को किनारा न कर।
लौट जा लहरें अपनी समंदर वापस,
साहिल की इबादत दुबारा न कर।
धर्म की होड़ ने तबाह कर दी एकता,
बाँटकर इसे हमारा-तुम्हारा न कर।
पुराने घरों मे दरवाजे गले मिलते थे,
अब अकेले दरवाजे से गुजारा न कर।
पवन नेताम 'श्रीबासु'
सिल्हाटी, कबीरधाम (छग)
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