वाह रे गद्दारों
वाह रे गद्दारो जिसने तुझे अपना दूध पिलाया था।
नन्हे हाथ पकड़कर जिसने चलना तुझे सिखाया था।।
ऐसी ममतामयी माँ के उपकारों को तू भूल गया।
गद्दारी और मक्कारी के फंदे पे तू है झूल गया।।
जिसने पैदा किया है तुझको उस पर ही गुर्राता है।
कैसा नाकारा है तू जो बाप को आँख दिखाता है।।
जनम से सीधे है पर अब टेढ़ा होकर दिखलायेंगे।
भगतसिंह की भाषा में अब तुमको हम सिखलाएँगे।।
याद करो सन् संतावन के उठे क्रांति उन ज्वालों को।
दुश्मन का मुँह तोड़ने वाले उन भारत के लालों को।।
जीभ पकड़कर तेरी हलक से बाहर हम खींच सकते है।
शांतिवादी है किंतु स्वाभिमान पर मुठ्ठी भी भींच सकते है।।
अगर रहे औकात में तो हम जीभरकर तुझे दुलारेंगे।
लेकिन फिर भी न सुधरे तो तेरे सीनेे मे तिरंगा गाड़ेंंगे।।
पवन नेताम 'श्रीबासु'
सूर साहित्य समिति कबीरधाम (छग)
भ्रमण भाष-9098766347,8770679568
अणु डाक-pawannetam7@gmail.com
अंतरताना-pawannetam.blogspot.com

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