तुलसी विवाह
सतयुग में एक, हुआ जालन्धर असुर।
शक्तिशाली बहुत, व्यवहार भी था क्रूर।
पत्नी वृंदा को पाकर, हुआ बहुत घमंड।
देवता- दानव नर पशु, सबको देता दंड।
इनके उपद्रव से, तीनों लोक थे परेशान।
देवता विष्णु से मिले, निकाले समाधान।
विष्णु ने समस्या का, दिया एक उपाय।
सभी देवता मिलकर,शंकर को भरमायें।
वृंदा के सतीत्व का, विष्णु ने किया ह्रास।
इधर शंकर जी, जालंधर का किया नाश।
हरि के छल कपट, हुआ ज्ञात जिस क्षण।
वृंदा से श्राप मिला,शिला हो जाओ तुरंत।
शिल होकर हरि ने, बदल लिए जो नाम।
सती श्राप से बन गए, पत्थर शालिग्राम।
माता वृंदा दाह कर, धरा पर हो गई राख।
तुलसी माता रूप धरी, बढ़ने लगी शाख।
विवाह तुलसी से किये,रखने अपनी बात।
रख कर साक्षी अग्नि को, फेरा मारे सात।
बीता समय शयन का,हरि उठनी है आज।
विवाह,पूजा शुरू कीजै,कीजै मंगल काज।
पवन नेताम 'श्रीबासु'
सिल्हाटी, कबीरधाम
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