नहका दे केवट हमला

            छत्तीसगढ़ी गीत
*'नहका दे केंवट हमला गंगा के पार'*

मातृ-पितृ भक्त,मर्यादा पुरुषोत्तम राम
जी पिता दशथ द्वारा कैकयी को दिये
वचनानुसार चौदह वर्ष का वनवास
स्वीकार,भाई लक्ष्मण एवं पत्नी सीता
के आग्रह पर उन्हे भी साथ लेकर जाते
है। राह मे गंगा नदी आती है जिन्हें पार
करने हेतु गुहा नामक केंवट से गंगा 
नदी पार करने आग्रह करते है। श्रीराम
जी एवं केंवट के रहस्यमयी शर्त के
बीच संवाद को इस गीत मे पिरोने 
का प्रयास किया गया है।

नहका दे केंवट हमला गंगा के पार।।
गंगा के पार केंवट -2
पहुंचा दे केंवट हमला गंगा के पार।।

                  (1)
चउदा बरस हमला ए राज छोड़ जाना,
समय झन बीताना पार जल्दी पहुंचाना।
केंवट कहय प्रभु  मरम तोर मै जाना,
पाँव धुर्रा परय त पथरा नारी बन जाना।
जादू भरे पांव तोर लीला हे अपार...

                  (2) 
कठवा के नांव कहू मोर नारी बन जाही,
रोजी रोटी बंद, परिवार भूखे मर जाही।
एक बेर तोर कहूं चरन ह धोवा जाही,
किरिया हे केंवट तुम ल नांव म चघाही।
भैया लक्ष्मण चाहे मोला तीर म दे मार...

                 (3)
मरमी राम समझ केंवट के सार बात,
लखन सिया ल देखके देवय वो हाँस।
ऊही कर भाई जेन मन म तोर आस,
बुता ले तहूँ अपन जिवरा के पियास।
केवटिन लाना पानी चरन ल ले पखार...

नहका दे केंवट हमला गंगा के पार।
पहुंचा दे केंवट हमला गंगा के पार।।


ध्रुवपद भावार्थ-
श्रीराम जी कहते है कि हे केंवट हमे
(स्वयं, सीता,लक्ष्मण)गंगा नदी के उस 
पार वनवास को जाना है। अतः आपसे आग्रह है हमे अपने नांव के जरिये यह
 नदी पार कराये।

भावार्थ(1)
- आगे श्रीराम जी कहते है कि हमने 
 माता-पिता के आज्ञानुसार चौदह वर्ष
 का वनवास स्वीकार किया है इसलिए
 इस अवधपुर के राज्य को छोड़कर
 जाना है,आप समय को जाया न करते
 हुए हमे शीघ्र पार करा दीजिए।
 इन बातो को सुनकर केंवट कहते है कि
 मै आपका भेद जानता हूँ श्रीराम जी
 सुना है आपके पैर का धूल मात्रा के 
 स्पर्श से पत्थर नारी बन जाती है।

भावार्थ(2)
- केंवट आगे कहते है कि हे राम मेरा
तो नांव लकड़ी से बनी है जो पत्थर
से भी नरम है। इन पर कही आपके 
चरण का धूल पड़ जाये तो ये भी नारी
बन जायेगी, मेरे घर मे तो पहले से 
एक नारी (पत्नी) है फिर दूजा कैसे 
और कहा रखूं, और यदि मेरी नांव नारी
बन जाती है तो मेरी रोजीरोटी बंद हो
जायेगी,मै पैसा कहां से कमाऊंगा, मुझे
तो इसके सिवाय कुछ काम आता ही 
नही हैं। फिर मै अपने परिवार का पालन
पोषण कैसे करूंगा।
आप अपने पैर का धूल धुलवा लीजिए
फिर मै वादा करता हूँ आप सबको गंगा
के पार बिना ही कोई उतरई (पार करने
का मेहनताना) लिये पहुंचा दूंगा। इन
बातो को सुनकर लक्ष्मण क्रोधित हो 
जाते है जिन्हे समझकर केंवट कहते है
कि चाहे मुझे लक्ष्मण अपने तीर से मार
देवे पर मै बिना पैर धुलाये नांव मे नही
बैठा सकता।

भावार्थ(3)
- श्रीराम जो सारे जगत को जानने 
 वाले है,सर्वदर्शी है, केंवट के इस 
 रहस्यमयी बात (केंवट भगवान श्रीराम
 के चरण पखारकर अपने एवंअपने
 सात पीढ़ी को तारना चाहते थे) को
 जान गये।इस रहस्य को समझकर
 सीता एवं लक्ष्मण की ओर देखकर
 मुस्कुरा देते है फिर केंवट को कहते
 है कि भाई आपके मन मे जो इच्छा है
 उसे पूरा कर लीजिए और हमे अति
 शीघ्र गंगा पार कराइये।
 तब प्रसन्न होकर केंवट अपनी पत्नी 
 से चरण पखारने हेतु कठौता(पानी
 रखने का पात्र) मे पानी भरकर लाने
 कहते है,फिर चरण पखार चरणामृत
 लेकर अपने एवं पूर्वजो को मोक्ष
 (जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति)
 दिलाते है। तत्पश्चात राम सीता एवं
 भाई लक्ष्मण जी को गंगा नदी पार
 कराते है।

                पवन नेताम 'श्रीबासु'
           सिल्हाटी, कबीरधाम (छ.ग.)

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