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फिल्टर पानी

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फिल्टर पानी कल मैं एक नई परम्परा से परिचित हुआ। मैं अपने दोस्त  के छोटे भाई जिसके होने वाली जीवन साथी को पैसा पकड़ाने/ रिश्ता तय करने गए थे। उस लड़की व उनके परिवार को ये लोग पहले देखकर आ चुके थे और लड़की पक्ष भी लड़के के घर दिखाई हो चुका था। अब लड़के पक्ष से सहपरिवार जा कर लड़की को पैसा पकड़ाना अर्थात् रिश्ता तय करना तथा विवाह का दिन तिथि भी तय करना था।        लड़के पक्ष से हम लोग छः गाड़ी दस सीटर लगभग पैंसठ लोग थे तथा लड़की पक्ष से लगभग बीस-पच्चीस लोग थे। लड़की को सभी के बीच बुलाया गया कुछ पूछताछ क्योंकि पूछने-जानने का मामला पहली बार में हो चुका था। तत्पश्चात सभी का चरण वंदन सभी ने अपने इच्छानुसार लड़की को पैसा दिये। नारियल, मिठाई वितरण हुआ विवाह की दिन तिथि तय हुआ।           अब संध्या भोजन का समय था सभी को बैठाया गया,पत्तल पुड़ी पापड़ परोसें गए इसमें कुछ बच्चों की सहभागिता थी फिर एक वरिष्ठ व्यक्ति बड़े पात्र (पानदान जैसा) में डिस्पोजल ले के आया जो आधा भरा था पंक्ति सह सबको पूछते बांटते आया उनका पूछना था 'फिल्टर पानी, फिल्टर...

देवारी जोहार !

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पोतव संगी घर दुवार,कचरा ल टारव जी। माटी के दिया ल, रिग-बिग ले बारव जी। देवता-धामी म हूम-धूप दिया ल जलाव। घर म सुख-समृद्धि,लक्ष्मी माई ल बुलाव। अंतस के अंधियार ल करना हे उजियार। मया पिरीत बाटव जात समाज गोतियार। सुंता के दियना जलाके, रखहू चारों खूट। तन ले कोसो दूर करव, कपट अऊ झूठ। कोठा म बैठे गौ माता के करव ग हियाव। जीवन भर सेवा करबो किरिया ल खाव। धरती दाईं के गुन गावव सेवा करव गाय। सुख-समृद्धि लक्ष्मी आही नइ होवय हाय। गौरा-गौरी, राऊत नाचा, लक्ष्मी के तिहार। छोटे-बड़े संगी जहुरिहा ल देवारी जोहार!          - पवन नेताम 'श्रीबासु'       सिल्हाटी, कबीरधाम (छ.ग.)

पोरा पटकना

पोरा पटकना पोरा तिहार के एक अऊ अंग जेन ल पोरा तिहार के संझा बेरा मनायें जाथे। जेन ल पोरा पटकना कहिथे। पोरा पटके के दू कारन सुने ल मिलथे ।  जेमा पहली धार्मिक कारन हे,                 द्वापर जुग म पोरासुर नाम के राक्षस रिहिस जेन ल भगवान कन्हैया ह गांव के मेड़ों म पटक-पटक के मारे रिहिस तेखर सेती आज ले पोरा ल पटक के तिहार ल मनाये जाथे।           पोरासुर ल कन्हैया द्वारा पटके गिस,गांव ले भगाये गिस त पोरासुर कहिस प्रभु भाग तो जहुं पर मैं खाहू-पीहू काला ? त कन्हैया द्वारा कहे गिस कि तै खेत-खार के किट पतंगा ल खाबे अऊ मेड़ो के भीतरी घुसन झन देबे‌। दूसर गोठ लोक मान्यता सुने ल मिलथे कि पोरा म ठेठरी-खुरमी ल भरके गांव के मेड़ों म पटके जाथे।           एखर संदर्भ कहिथे कि हमर फसल के नाश करइयां ल खाथे तेखर सेती शुरूआत म ठेठरी-खुरमी ले मुंह मीठा कराये जाथे तहां ले फसल के कटत ले किट पतंगा मन ल खावत राहय।                 कुल मिलाके ए मान्यता के पाछू भाव हे कि गांव अऊ ...

पोरा या पोला..?

पोरा या पोला..? *भैया सुशील भोले के कलम ले*✍️✍️✍️       आजकाल ए देखे म जादा आवत हे, के हमर इहाँ के लोगन अपन परंपरा-संस्कृति के मूल स्वरूप ल जाने-समझे ल छोड़ के पर के पाछू भेड़िया धसान बरोबर किंजरई ल जादा गरब के मान डरथें.     अभी बीते दिन कमरछठ परब ल देखे रेहेन, लोगन उत्तर भारत ले आए लोगन मन के देखासिखी एला हलषष्ठी बतावत बलराम जयंती काहत रिहिन हें. एदे अब अवइया 'पोरा' परब के संबंध म घलो अइसने देखे जावत हे. पोरा ल हिंदीकरण करत 'पोला' कहे जावत हे, सोशलमीडिया के ठीहा तो अंखमूंदा मन के बसेरा बनगे हवय.       असल म हमर छत्तीसगढ़ म मनाए जाने वाला परब ह 'पोरा' आय. छत्तीसगढ़ी भाखा म पोला शब्द छेदा, भोंगरा या पोलपोला खातिर उपयोग करे जाथे. जबकि हमर इहाँ पोरा के परब मनाए जाथे, वो ह धान म पोर फूटना, पोटरी या पोठरी पान धरे के अवस्था, जेला गर्भधारण के अवस्था कहे जाथे, तेकर सेती मनाए जाथे. एकरे सेती ए दिन किसान मन अपन अपन खेत म पोरा म रोटी पीठा चढ़ाथें, जे ह धान के फसल ल गर्भधारण करे के सेती सधौरी खवाए के प्रतीक स्वरूप होथे. जइसे हम अपन बेटी-माई मनला प...

तुम अल्हण नदी

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हमारी संगिनी को समर्पित... तुम अल्हण नदी, झूमती,खेलती,गाती। पर्वत पठार बयार पेड़-पौधे मै झाड़। तू वर्ण,अक्षर,शब्द, शोर, कभी स्तब्ध। मै थाट, राग, मीट, शायरी,गज़ल, गीत। तू चंचल,चंचला,प्याली, मधुशाला,मतवाली, नथनी,बिंदिया,बाली, काजल मै लाली, प्रीत, प्रेम, चपेहा, नेह, नयन तू 'नेहा'। मैं नभ, नक्षत्र, गगन, पतंग, पतझड़, 'पवन'।           पवन नेताम 'श्रीबासु'       सिल्हाटी, कबीरधाम (छ.ग.)

कबीर जयंती विशेष

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कबीर के दोहों में छिपा जीवन का सार                संत कबीर आम जनमानस में कबीरदास या कबीर साहेब के नाम से लोकप्रिय हैं । कबीरदास का जन्म के संदर्भ में निश्चित रूप से कुछ कह पाना संभव नहीं है । मान्यतानुसार ज्येष्ठ मास पूर्णिमा को कबीर जयंती के रूप में मनाया जाता है। किवदंती के अनुसार संत कबीर ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन काशी में लहरतारा तालाब के पास अपने पालक माता पिता नीरू और नीमा को मिले थे,तब से इस दिन को कबीर जयंती के रूप में मनाया जाता है ।         कबीर साहेब ने अपने दोहों, विचारों और जीवनवृत से मध्यकालीन भारत में क्रांति का सूत्रपात किया था।कबीर साहेब ने तत्कालीन समय के अंधविश्वास,रूढ़िवाद, पाखंडवाद का घोर विरोध किया।उन्होंने उस काल में भारतीय समाज में विभिन्न धर्मों और समाज के मेलजोल का मार्ग दिखाया। हिंदू इस्लाम सभी धर्मों में व्याप्त कुरीतियों और पाखंडो पर कड़ा प्रहार किया। एक और वो हिंदू धर्म में मूर्तिपूजा का विरोध करते हुए कहते हैं की - *पाहन पूजे हरि मिले तो मैं पूजूं पहार,वा ते तो चाकी भली,पीसी खाए संसार ।*...

छोटी मगर मोटी बातें

आज़_की_बात मनमुटाव और नदी का उदगम बहुत छोटा होता है, किंतु जैसे-जैसे ये आगे बढ़ते हैं, विशाल रूप धारण कर लेते हैं!  किरदार तो अक़्सर नकाब में ही रहता है, लोग इंसान की पहचान उनकी अदाकारी से करते हैं! चालाकियों से कुछ देर ही मोहित किया जा सकता है, दिल जीतने के लिए सरल और सहज होना जरूरी है! -- राजकुमार मसखरे 

सीख

राजनीति कुर्सी को लकड़ी समझा तो कीड़ा कुर्सी को खा जाता हैं। और कुर्सी को कुर्सी समझा तो कुर्सी आदमी को खा जाता है। अहम् बाढ़ से तकरार कर पेड़, बह जाता है। और बाढ़ से नम्र हो कर घास, रह जाता है। सहनशीलता मेहनत करने वाला धूप और पानी को सह जाता है । और मेहनत कराने वाला धूप और पानी में ढह जाता है। घमंड आग को जो आग समझता वो बच जाता है। आग को जो खाक समझता वो खप जाता है।               -पवन नेताम 'श्रीबासु'

राम को माने,राम का नही

   राम को माने,राम का नही      (राम की प्रकृति पूजा) ~~~~~~~~~~~~~~~ ओ मेरे  प्रभु  वनवासी राम आ जाओ  अपनी धराधाम, चौदह वर्ष तक पितृवचन में वन-वन विचरे बिना विराम! निषाद राज गंगा पार कराये कंदमूल खाकर सरिता नहाए, असुरों  को  राम  ख़ूब संहारे ऋषिमुनियों को जो थे सताए ! भूमि  कन्या  थी  सीतामाई शेष  अवतारी लक्ष्मण भाई , पर्ण कुटी सङ्ग,घास बिछौना भील राज  सङ्ग करे मिताई ! सबरी को तारे, अहिल्या उबारे  गिलहरी,जटायू सङ्ग कागा कारे, सङ्ग-सङ्ग रहे रीछ,वानर मितवा ऐसे  थे  प्रभु श्रीराम जी  हमारे ! लोग पूजे, सिर्फ चित्र तुम्हारे चरित्र को तुम्हारे जाना नही , राम को तो ये रात-दिन माने पर राम का तनिक माना नही !        -- राजकुमार 'मसखरे' मु.-भदेरा (गंडई),जि.-केसीजी,(छ.ग.)

तुलसी

माता बृंदा तुलसी होगे,  विष्णु होगे सालिकराम। धरिन नवा अवतार प्रभू जी, आगे बनके सुख के धाम। अब निद्रा ले जागव जल्दी, प्रभु जी अपन सम्हालव भार। संग-संग तुलसी माता के, अंगना रहव बिराज हमार। जय लक्ष्मीपति दीनदयाला, बगरावव सुख-शांति उजास। हम सब आवन तोरे लइका,  पुरा करव मन इच्छा आस।                 पवन नेताम 'श्रीबासु'