देवारी जोहार !

पोतव संगी घर दुवार,कचरा ल टारव जी।
माटी के दिया ल, रिग-बिग ले बारव जी।
देवता-धामी म हूम-धूप दिया ल जलाव।
घर म सुख-समृद्धि,लक्ष्मी माई ल बुलाव।
अंतस के अंधियार ल करना हे उजियार।
मया पिरीत बाटव जात समाज गोतियार।
सुंता के दियना जलाके, रखहू चारों खूट।
तन ले कोसो दूर करव, कपट अऊ झूठ।
कोठा म बैठे गौ माता के करव ग हियाव।
जीवन भर सेवा करबो किरिया ल खाव।
धरती दाईं के गुन गावव सेवा करव गाय।
सुख-समृद्धि लक्ष्मी आही नइ होवय हाय।
गौरा-गौरी, राऊत नाचा, लक्ष्मी के तिहार।
छोटे-बड़े संगी जहुरिहा ल देवारी जोहार!
         - पवन नेताम 'श्रीबासु'
      सिल्हाटी, कबीरधाम (छ.ग.)

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