तुम अल्हण नदी

हमारी संगिनी को समर्पित...

तुम अल्हण नदी,

झूमती,खेलती,गाती।

पर्वत पठार बयार

पेड़-पौधे मै झाड़।


तू वर्ण,अक्षर,शब्द,

शोर, कभी स्तब्ध।

मै थाट, राग, मीट,

शायरी,गज़ल, गीत।


तू चंचल,चंचला,प्याली,

मधुशाला,मतवाली,

नथनी,बिंदिया,बाली,

काजल मै लाली,


प्रीत, प्रेम, चपेहा,

नेह, नयन तू 'नेहा'।

मैं नभ, नक्षत्र, गगन,

पतंग, पतझड़, 'पवन'।


          पवन नेताम 'श्रीबासु'

      सिल्हाटी, कबीरधाम (छ.ग.)


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