कबीर जयंती विशेष

कबीर के दोहों में छिपा जीवन का सार
       

       संत कबीर आम जनमानस में कबीरदास या कबीर साहेब के नाम से लोकप्रिय हैं । कबीरदास का जन्म के संदर्भ में निश्चित रूप से कुछ कह पाना संभव नहीं है । मान्यतानुसार ज्येष्ठ मास पूर्णिमा को कबीर जयंती के रूप में मनाया जाता है। किवदंती के अनुसार संत कबीर ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन काशी में लहरतारा तालाब के पास अपने पालक माता पिता नीरू और नीमा को मिले थे,तब से इस दिन को कबीर जयंती के रूप में मनाया जाता है ।
        कबीर साहेब ने अपने दोहों, विचारों और जीवनवृत से मध्यकालीन भारत में क्रांति का सूत्रपात किया था।कबीर साहेब ने तत्कालीन समय के अंधविश्वास,रूढ़िवाद, पाखंडवाद का घोर विरोध किया।उन्होंने उस काल में भारतीय समाज में विभिन्न धर्मों और समाज के मेलजोल का मार्ग दिखाया। हिंदू इस्लाम सभी धर्मों में व्याप्त कुरीतियों और पाखंडो पर कड़ा प्रहार किया। एक और वो हिंदू धर्म में मूर्तिपूजा का विरोध करते हुए कहते हैं की -
*पाहन पूजे हरि मिले तो मैं पूजूं पहार,वा ते तो चाकी भली,पीसी खाए संसार ।*
          और इस्लाम की जड़ता पर चोट करते हुए कहते हैं की -
*कंकर पत्थर जोड़ कर मस्जिद लई बनाय,ता ऊपर चढ़ी मूल्ला बांग दे,क्या बहरा हुआ खुदाय।*
        कबीर साहेब जी ने जात पात,सामाजिक भेद भाव का भी जम कर विरोध किया और सभी मनुष्य को एक ही रचनाकार से उत्पन्न माना ।
*हिंदू कहे मोहि राम पियारा, तुर्क कहे रहमाना,आपस में दोउ लड़ी लड़ी मुए, मरम न कोऊ जाना ।*
       कबीर जी केवल एक समाज सुधारक ही नही वरन आध्यात्मिक रहस्यवाद के उच्च कोटी के कवि और संत थे -
*जल में कुंभ,कुंभ में जल है, बाहर भीतर पानी। फूटा कुंभ जल  जलहि समाना, यह तत सुनहु गियानी ।।*
        संत कबीर जी ने आध्यात्मिक स्तर पर लोगों को  जाति,धर्म ,पंथ का भेद भुलाकर एक निराकार ब्रह्म की उपासना का मार्ग दिखाया। उनका कहना था कि -
*प्रथम एक तो आयै आप, निराकार निर्गुण निर्जाय।*
        आज भी कबीर साहेब जी और उनके विचार आमजन का मार्गदर्शन करते हैं तथा समाज की बड़ी से बड़ी समस्या का हल प्रदान करते हैं ।

     आप सभी को संत सम्राट सद्गुरु कबीर साहेब जी की जयंती की हार्दिक शुभकामनाएँ🙏🏽
           -- *राजकुमार मसखरे*

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