मुक्तक

हर परिंदे को बसर कहां मिलता है!
हर हुस्न को नजर कहां मिलता है!
कितने तजुर्बे बटोरने पड़ते है यहां,
आसानी से कोई हुनर कहाँ मिलता है!

रात गुजर जाता है किसी की यादों में!
दिन सँवर जाता है किसी की यादों में!
पहली मोहब्बत के क्या किस्से सुनाऊं,
मन निंखर जाता है किसी की यादो मे!

ये शर्म-ए-हयां अपनी छुपा के रखिए।
फिसल जाये न यौवन बचा के रखिए।
लेके आऊंगा डोली तेरे घर एक दिन,
अपने हाथों मे मेंहदी सजा के रखिए।

तेरी यादो मे आज भी पलके भिंगाएँ बैंठे है।
जाने कब दीदार होगा नजरें बिछाए बैंठे है।
तेरे प्यार का हर - पल एहसान है मुझ पर,
आज भी तेरे दीदार की आस लगाए बैंठे हैं।

जख़्मे दिल पर मरहम लगाने नही आई।
मेरे कब्र पे दो फूल भी सजाने नही आई।
तजुर्बा कहाँ था मुझे कश्ती किनारा लगाने का,
जो थी मेरी वही थी पर बचाने नही आई।

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