कोई उन्हें श्राप समझते है, कोई उन्हें पाप समझते है।
निरे कुछ मुर्ख है जो छांव को ताप समझते है।
नौजवां लोग मेरी सुन लो, कल माँ-बाप दौलत थे,
पर फरेबी लोग दौलत को, आज माँ-बाप समझते है।
सतयुग में एक, हुआ जालन्धर असुर। शक्तिशाली बहुत, व्यवहार भी था क्रूर। पत्नी वृंदा को पाकर, हुआ बहुत घमंड। देवता- दानव नर पशु, सबको देता दंड। इनके उपद्रव से, तीनों लोक थे परेशान। देवता विष्णु से मिले, निकाले समाधान। विष्णु ने समस्या का, दिया एक उपाय। सभी देवता मिलकर,शंकर को भरमायें। वृंदा के सतीत्व का, विष्णु ने किया ह्रास। इधर शंकर जी, जालंधर का किया नाश। हरि के छल कपट, हुआ ज्ञात जिस क्षण। वृंदा से श्राप मिला,शिला हो जाओ तुरंत। शिल होकर हरि ने, बदल लिए जो नाम। सती श्राप से बन गए, पत्थर शालिग्राम। माता वृंदा दाह कर, धरा पर हो गई राख। तुलसी माता रूप धरी, बढ़ने लगी शाख। विवाह तुलसी से किये,रखने अपनी बात। रख कर साक्षी अग्नि को, फेरा मारे सात। बीता समय शयन का,हरि उठनी है आज। विवाह,पूजा शुरू कीजै,कीजै मंगल काज। पवन नेताम 'श्रीबासु' सिल्हाटी, कबीरधाम
मैं छत्तीसगढ़ के जिस इलाके (खैरागढ़ छुईखदान गंडई) से आता हूँ, वह मैकल पर्वत श्रेणी का पूर्वी भाग है । राजनांदगांव-कवर्धा रोड के पश्चिम में मैकल पर्वत श्रेणी है और उसके पूर्व से मैदानी इलाका शुरू हो जाता है । यहाँ की काली मिट्टी बेहद उपजाऊ है जो ओन्हारी (रबी) फ़सल के लिए अनुकूल है । इस क्षेत्र में पहले चना की फ़सल खूब ली जाती थी और वैसे ही पैदावार भी होता था । यहाँ चना की एक देसी किस्म 'सुंदरी' एक बड़े रकबे में बोई जाती थी, जो खाने में बहुत स्वादिष्ट थी । मार्केट में हाईब्रिड बीज के आने से यह किस्म विलुप्त हो गई । यहाँ टमाटर की फ़सल भी खूब होती थी और आज भी होती है । सहसपुर लोहारा से साजा तक, साजा से धमधा तक, धमधा से जालबाँधा-घुमका और ठेलकडीह तक और वहाँ से मैकल श्रेणी का पाद प्रदेश अर्थात खैरागढ़ छुईखदान गंडई का यह इलाका टमाटर उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है । लेकिन यहाँ टमाटर का जितना उत्पादन होता है उसका वास्तविक लाभ किसानों को नहीं मिल पाता है । एक तो टमाटर का भाव नहीं रहता । आज लगभग चार माह हो गये, मंडी में उसकी कीमत लगभग 3-4 रुपये किलो से ज्यादा ...
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