मुक्तक मंच

एक दिवाना हूँ दिल को निकाल रख दूंगा।
मिले जो दिल तो दिल को सम्हाल रख लूंगा।
रगो मे बह रही है खून सिर्फ तेरे प्यार की,
यकीं नहीं  तो  वो  भी निकाल रख दूंगा।

चुराता हूँ नजर जब जब तू मेरे पास होती है!
मगर दिनरात इन नजरों को तेरी प्यास होती है!
मैं शर्मीला हूँ कह पाता नही लेकिन मेरी जानम,
खुदा से बस तेरे ही नाम की अरदास होती है!!

मेंरे चिट्ठी को पढ़कर वो वहां जब मुस्कुराती है !
हवा तब-तब मेरे कानों में आकर गुनगुनाती है!
मुझे यादों से उसकी एक पल फुर्सत नही मिलती,
मैं सो जाता हूँ पर ख्वाबो में वो मुझको सताती है!!

रामसेतु सी प्रेम की निशानी नही देखी !
राधाकृष्ण सी प्रेम की कहानी नही देखी !
खुद के लिए नही देश के काम आई जो,
भगत सिंह सी आजतक जवानी नही देखी!!

प्रेम  पावन है मैं तुमको एक दिन ये बताऊंगा।
हृदय मंदिर में एक दीपक प्रेम का मैं जलाऊंगा।
प्रेम पाना नही है त्याग है मीरा- राधा से सीखो तुम,
मैं उनकी दास्ता आकर तुम्हें इकदिन सुनाऊंगा।

सहेलियों के पीछे छुप-छुप, के वो दीदार करती थी।
मेरे काँलेज की थी लड़की,जो मुझसे प्यार करती थी।
किसी भी मोड़ पर उनसे, कही हो जाता जो तकरार
तो झुकी नजरों से अपने प्यार का, वो इजहार करती थी
               पवन नेताम 'श्रीबासु'
                कबीरधाम (छ.ग.)

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