मोहनी श्रृंगार है

होंठो में लगी है लाली,कानो मे है झूमें बाली।
कजरारे काले काले,नयन कटार है।

बिंदिया है माथ और,सर पे चुनर ओढ़े।
नागिन सी चाल लिये,गले मोती  हार है।

सोला की उमर हाय,जियरा को धड़काय।
मन मोह लेती जब,करती श्रृंगार है।

सब उसे चाहते है,पर जिसे चाहती वो
उस प्रियतम का वो,करे इंतजार है।

पवन नेताम 'श्रीबासु'
सिल्हाटी,कबीरधाम (छ.ग.)

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