तेरा श्रृंगार

खुले जब होंठ सुनाती कोयल की कुहकियां।
कोई राग सा लगता है जब खनकती चुड़ियाँ ।
कातिलाना अंदाज नैनन तीर कटार की धार,
श्रृंगार साज उड़ती है रंग रंगीनी सी तितलियां।

                पवन नेताम 'श्रीबासु'

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