जाग उठो अब जागो हिन्दू
*जाग उठो अब जागो हिन्दू, धरा पड़ी संकट मे।*
समस्या की भीड़ खड़ी है, देखो तुम्हारे निकट मे।।
जिनको हमने शरण दे रखा,वही हमारे विरोधी है।
घर का भेदी लंका ढाये, ऐसे बन गये भेदी है।।
दिखला दो हिन्दू की ताकत,शंकर के हम वंशज है।
दुश्मन के लिए क्रोधी, नही तो सरल सहज है।।
रामनाम की लेख लेकर, तुमने बांधे योजन समुंद को।
बाढ़ लाने की ये बाते करते,पी जाओ ऐसे बूंद-बूंद को।।
*जनम से सीधे है हम सब, अब टेढ़ा हो दिखला दो*
*मार भगाओ नमकहरामो को,या सीने मे तिरंगा गड़ा दो।।*
पवन नेताम 'श्रीबासु'
सूर साहित्य समिति कबीरधाम (छ.ग.)
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