मिन्नतों के बाद
................ *गज़ल*..................
मिन्नतों के बाद भी जो कभी मिला नही
न जाने क्यों आज वो पास आने लगे!
जिन्हें अपना बनाने के बुने थे कई सपने
उन सपनों को वो हकीकत बनाने लगे।
मरुथल सा था दिल मेरा आबाद हो उठा,
शबनमी होंठो से जब वो जाम पिलाने लगे।
रहमत थी तेरी या किसी की दुआ ऐ ख़ुदा,
कातिल अदाओं से वो पागल बनाने लगे।
बियाबान थी जिंदगी,उपवन सी महकउठी,
जिंदगी के बाग में फिर भौरें मंडराने लगे!
बड़ी जादूगरी है क्या कहे अदाये किस्से,
खुद के होकर हम खुद से दूर जाने लगे!
✍🏻 पवन नेताम 'श्रीबासु'
सिल्हाटी, स/लोहारा,जिला-कबीरधाम
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