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मुक्तक मंच

एक दिवाना हूँ दिल को निकाल रख दूंगा। मिले जो दिल तो दिल को सम्हाल रख लूंगा। रगो मे बह रही है खून सिर्फ तेरे प्यार की, यकीं नहीं  तो  वो  भी निकाल रख दूंगा। चुराता हूँ नजर जब जब तू मेरे पास होती है! मगर दिनरात इन नजरों को तेरी प्यास होती है! मैं शर्मीला हूँ कह पाता नही लेकिन मेरी जानम, खुदा से बस तेरे ही नाम की अरदास होती है!! मेंरे चिट्ठी को पढ़कर वो वहां जब मुस्कुराती है ! हवा तब-तब मेरे कानों में आकर गुनगुनाती है! मुझे यादों से उसकी एक पल फुर्सत नही मिलती, मैं सो जाता हूँ पर ख्वाबो में वो मुझको सताती है!! रामसेतु सी प्रेम की निशानी नही देखी ! राधाकृष्ण सी प्रेम की कहानी नही देखी ! खुद के लिए नही देश के काम आई जो, भगत सिंह सी आजतक जवानी नही देखी!! प्रेम  पावन है मैं तुमको एक दिन ये बताऊंगा। हृदय मंदिर में एक दीपक प्रेम का मैं जलाऊंगा। प्रेम पाना नही है त्याग है मीरा- राधा से सीखो तुम, मैं उनकी दास्ता आकर तुम्हें इकदिन सुनाऊंगा। सहेलियों के पीछे छुप-छुप, के वो दीदार करती थी। मेरे काँलेज की थी लड़की,जो मुझसे प्यार करती थी। किसी भी मोड़ पर उनसे, कही ...

मुक्तक

हर परिंदे को बसर कहां मिलता है! हर हुस्न को नजर कहां मिलता है! कितने तजुर्बे बटोरने पड़ते है यहां, आसानी से कोई हुनर कहाँ मिलता है! रात गुजर जाता है किसी की यादों में! दिन सँवर जाता है किसी की यादों में! पहली मोहब्बत के क्या किस्से सुनाऊं, मन निंखर जाता है किसी की यादो मे! ये शर्म-ए-हयां अपनी छुपा के रखिए। फिसल जाये न यौवन बचा के रखिए। लेके आऊंगा डोली तेरे घर एक दिन, अपने हाथों मे मेंहदी सजा के रखिए। तेरी यादो मे आज भी पलके भिंगाएँ बैंठे है। जाने कब दीदार होगा नजरें बिछाए बैंठे है। तेरे प्यार का हर - पल एहसान है मुझ पर, आज भी तेरे दीदार की आस लगाए बैंठे हैं। जख़्मे दिल पर मरहम लगाने नही आई। मेरे कब्र पे दो फूल भी सजाने नही आई। तजुर्बा कहाँ था मुझे कश्ती किनारा लगाने का, जो थी मेरी वही थी पर बचाने नही आई।

माँ बाप

कोई उन्हें श्राप समझते है, कोई उन्हें पाप समझते है। निरे कुछ मुर्ख है जो छांव को ताप समझते है। नौजवां लोग मेरी सुन लो, कल माँ-बाप दौलत थे, पर फरेबी लोग दौलत को, आज माँ-बाप समझते है।        

भाईचारा कह-कह,देश को जो खा रहे

राम और कृष्ण वाला,पावन ये देश जहाँ, आतंक का कुछ लोग,जहर फैला रहे ! दुनिया को शांति वाला,मिलता संदेश जहां उस पावनी धरा को,पाप से लजा रहे! जिस मां ने पाला पोसा,इनको दुलार दिया आँचल में उसके ही,आग है लगा रहे! वध करो सारे कालनेमियों का ढूँढ़-ढूँढ़  भाईचारा कह-कह,देश को जो खा रहे!!              पवन नेताम श्रीबासु

लाँकडाऊन म दरूहा मन के दशा

चित्र
कतका कन पिये हे मंदहा भुइयां म परे हे। करलई हे दाऊ  कुकुर मन चाटे बर धरे हे। खाये बर पइसा नही काहय हाथ होगे सुन्ना। खुलगे  भट्ठी ह त  दरूहा मन  ल होगे गुन्ना। काला बेचिस कहाले लाइस बाई ह रोवत हे। मस्त मतंगा नशा होगे जिहा तिहा सोवत हे। कोरोना के  नइहे डर  डट्टा म लाइन लगे हे। बिहनिया  के  गेहे भट्ठी  परान ऊहे  तजे हे। वाह रे चतुर सरकार  तोर महिमा हे अपार। मंदिर के पट बंद हे इहा भट्ठी म लगे दरबार।              पवन नेताम 'श्रीबासु'          सिल्हाटी, कबीरधाम(छ.ग.) चेपटी ल पियत हे चेपटत हे गाल ह , उपर ले हाँसत हे बैरी करिया काल ह, देख जिंदगी ल कैसे उड़ावत हे, दु पैसा के दारू म का मजा पावत हे, अब तो सुधर जव घर होवत बदहाल ग, ऊपर ले काल हाँसय देख तुहर हाल ग ,  सुरेंद्र निषाद विश्रामपुर सिमगा