जब बाई ह चल दिस मायके


"सजा मिलत हावय आंखी देखाये के"

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सजा मिलत हावय आंखी देखाये के।
मजा मिलत हावय गुस्सा देखाये के।
जब भौजी ह चलदिस अपन मायके....
जब बाई ह चलदिस अपन मायके।

होगे बिहानिया अब लफड़ा हे बाहरे के।
पोछा लगावव कइसे अउ झंझट हे मांजे के।
भुलागे हव समय स्कुल जाये के....
जब भौजी ह चलदिस..

गिल्ला होगे भात ह कइसे एहा चुरगे।
गुस्सा अउ गुस्सा म अंग-अंग ह घुरगे।
कतका होवत हे लफड़ा खाये अउ बनाये के...
जब भौजी ह चलदिस..

घर ह रात कन किरा कस चाबत हे।
सुवारी के चेहरा ह आंखी म झुलत हे।
सुरत आवत हे ओखर मसकरी लगाये के....
जब भौजी ह चलदिस...

रतिहा कन बाई ह सोये हावय बाजू।
संग म सोये हावय बेटा मोर राजू।
देखत हावय सपना मया पायके....

सजा मिलत हावय आंखी देखाये के।
मजा मिलत हावय गुस्सा देखाये के।
जब भौजी ह चलदिस अपन मायके...
जब बाई ह चलदिस अपन मायके..
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रचना - पवन नेताम "श्रीबासु"
     सिल्हाटी स/लोहारा
       कबीरधाम (छग)
    मोबा. 9098766347

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