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स्व.श्री दाऊलाल मंदराजी ल समर्पित

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आज नाचा गम्मत के पुरखा स्व. श्री दाऊलाल मंदराजी के जयंती म नाचा के तर्ज म समर्पित ओला एक गीत..                      (दादरा) छ.ग. के नांदगांव मे...-2 जनम धरिन मनखे खाटी ऐ, इही पुरखा इही थाती ऐ -4 (1) नांदगांव के गांव रवेली, ओखर जनम अस्थाने। गांव के एक किसनहा बेटा ह बनाइस अलग पहिचाने। -नाचा गम्मत के जनम करिन ऐ-2कतका सुघर परिपाटी ऐ, इही पुरखा इही थाती ऐ....                      (लग्गी) (2)रहिस नामे दुलार आवय गौटिया परिवार,    1 अप्रेल 1911 के जनमिस ओहा यार।      रामाधीन के ओ बेटा - मंदराजी ऐ न      नाचा गम्मत के पुरखा- मंदराजी ऐ न       ओ तबलची चिकरहा- मंदराजी ऐ न       मनोरंजन करैया - मंदराजी ऐ न (3)गांव-गांव बगराईस नाचा गम्मत देखाइस,     जन-जन म सुघर संदेश पहुचाईस।     पोंगवा पंडित के रचाईया- मंदराजी ऐ न     इरानी गम्मत बनाईया- मंदराजी ऐ न      मरारिन गम्...

देने वाला जब भी देथे कहिथे छप्पर फाड़ के

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                  हमला गरीब कहिथे देने वाला जब भी देथे, कहिथे छप्पर फाड़ के। फेर हमला काबर बनायेस गरीब बेकार के । कोन जनम के बदला ले, गरीब पैदा करेस तै। अच्छा बनावत बनावत,मूर्ति ल बिगाड़ डरेस तै। न चऊर न दार, न खेत न खार के....... छीन के हमर हासी ल, कहिथस रोवव झन। दुख के बीजहा  देके, कहिथस बोवव झन। पापी पेट बर कुछू नही, जियव कहिथस मार के...  हमर कोनो पता, न हावय कोनो ठिकाना । दुख म कलहरत हन, मुरलीधर अब आना। दुख ल रोवत, बुलावत हन गोहार के...             पवन नेताम 'श्रीबासु'    सिल्हाटी, स/लोहारा, कबीरधाम           मोबा.- 9098766347

प्रिय तुम रामचरितमानस पढ़ना

*प्रिय तुम रामचरितमानस जरूर पढ़ना।।.....*. जीवन के अनुबंधों की, तिलांजलि संबंधों की,  मन के टूटे हुए तारो की, फिर से नई कड़ी गढ़ना, *प्रिय तुम रामचरितमानस पढ़ना।।* बेटी का धर्म निभाने को, पत्नी का मर्म सिखाने को, भाई का प्रेम बताने को, हर पंक्ति ध्यान से तुम सुनना, *प्रिय तुम रामचरितमानस पढ़ना।।* लक्ष्मण से सेवा त्याग सीख, श्री भरत से राज विराग सीख, प्रभु का सबसे अनुराग सीख, फिर माता सीता को गुनना, *प्रिय तुम रामचरितमानस पढ़ना।।* केवट की भक्ति भरी गगरी, फल मीठे बेर लिए शबरी, है धन्य अयोध्या की नगरी, अवसादों में जब भी घिरना, *प्रिय तुम रामचरितमानस पढ़ना।।* न्याय नीति पर राम अड़े, संग सखा वीर हनुमान खड़े, पशु-पक्षी तक हैं युद्ध लड़े, धन्य हुआ उनका तरना, *प्रिय तुम रामचरितमानस पढ़ना।।* जो राम नाम रघुराई  है, जीवन की मूल दवाई है, हर महामंत्र चौपाई है, सियाराम नाम जपते रहना, *प्रिय तुम रामचरितमानस पढ़ना।।* जगती में मूल तत्व क्या है? राम नाम का महत्व क्या है? संघर्ष में राम रमत्व क्या है? संकट में  तुम जब भी फंसना, *प्रिय तुम रामचरितमानस पढ़ना।।* हर समाधान मिल जाता है, कोई प्रश...

हसदेव के जंगल बचा लेवव न

धरती के छाती के गोरस सूखागे, तरिया कुवा नदिया नरवा अटागे, -बिजली बनइंया के कोयला सिरागे, हाय रे विकास बलि जंगल के मांगे। उठव ग भइया जागव ग भइया, हमर जिनगी के सांसे रखइया  सिरान दिहव का, छइंहा ए सुघ्घर,हसदेव के जंगल बचा लेवव न..

जीवन का एक रहस्य

जीव, विशेष कर मनुष्यों के लिए यह शरीर एक सिक्का है। परमात्मा टकसाल है जहाँ प्रत्येक जीव के लिए शरीर एक मापदंड मे निर्माण करता है।                 जीव सिक्का रूपी तन पाकर इस संसार मे चलता है। वह सिक्का एक हाथ से दुसरे हाथ घुमते रहता है अर्थात् यह सिक्का रूपी तन संसार मे भटकते रहता है।      मोह,माया,काम,क्रोध,मद,लोभ व ईर्ष्या ये अलग अलग व्यवसाय है। सिक्का एक ही है परन्तु इन अलग-अलग व्यवसाय मे भिन्न-भिन्न स्थानो मे भटकते रहता है। अर्थात् यह शरीर कभी मोह के कारण तो कभी माया तो कभी लोभ...के कारण भटकते रहता हैं।       जिस प्रकार सिक्का खजाना या तिजोरी मे कभी चित तो कभी पट (सिक्के का दो पहलू) की अवस्था मे पड़े रहता है या कुछ समय तक वह चित और कुछ समय पट की अवस्था मे तिजोरी मे रहता है और यही प्रक्रिया उनके स्थान बदलने पर होते रहती है।       ठीक उसी प्रकार इस शरीर को इस संसार मे या सूक्ष्म रूप मे कहे तो परिवार मे चित की अवस्था मे सुख और पट की अवस्था मे दु:ख की प्राप्ति होते रहती है और यही परिवर्तन इस संसार का नियम...

भलाई

एक रेस्टोरेंट में कई बार देखा गया  कि, एक व्यक्ति (भिखारी) आता है और भीड़ का लाभ उठाकर नाश्ता कर चुपके से बिना पैसे, दिए निकल जाता है। एक दिन जब वह खा रहा था तो एक आदमी ने चुपके से दुकान के मालिक को बताया कि यह भाई भीड़ का लाभ उठाएगा और बिना बिल चुकाए निकल जाएगा। उसकी बात सुनकर रेस्टोरेंट का मालिक मुस्कराते हुए बोला – उसे बिना कुछ कहे जाने दो, हम इसके बारे में बाद में बात करेंगे। हमेशा की तरह भाई ने नाश्ता करके इधर-उधर देखा और भीड़ का लाभ उठाकर चुपचाप चला गया। उसके जाने के बाद, उसने रेस्टोरेंट के मालिक से पूछा कि मुझे बताओ कि आपने उस व्यक्ति को क्यों जाने दिया। रेस्टोरेंट के मालिक ने कहा आप अकेले नहीं हो, कई भाइयों ने उसे देखा है और मुझे उसके बारे में बताया है। वह रेस्टोरेंट के सामने बैठता है और जब देखता है कि भीड़ है, तो वह चुपके से खाना खा लेता है। मैंने हमेशा इसे नज़रअंदाज़ किया और कभी उसे रोका नहीं, उसे कभी पकड़ा नहीं और ना ही कभी उसका अपमान करने की कोशिश की.. क्योंकि मुझे लगता है कि मेरी दुकान में भीड़ इस भाई की प्रार्थना की वजह से है वह मेरे रेस्टोरेंट के सामने बैठे हुए प्रार...

अक्ती तिहार के गोठ...

खेती किसानी के नवा बच्छर अकती तिहार म पुतरी-पुतरा बिहाव के परम्परा - दुर्गा प्रसाद पारकर छत्तीसगढ़ी लोक कथा के मुताबिक बहुत दिन पहिली के बात आय जब रतनपुर के राजा के दरबार म कतको सौंजिया, बइला चरवाहा अउ दरोगा कस कतको कमइया मन सेवा बजाये। कमइया मन के मारे राज दरबार ह भरे-भरे लागे। इहें बइठमल नाव के एक झिन नौकर घलो राहय। निच्चट कोड़िहा राहे बइठमल ह। एकर अलाली ह राजा के आंखी म पहिलीच्च ले खटकत रीहिस हे। उपराहा म एक दिन बइठमल ह दरबार ल बहारे-बटोरे बर बिसर डरिस। दरबार म कचरा ह जतर कतर बगरे राहे। राज दरबार के हालत ल देख के राजा ह बइठमल उपर बिफड़गे। गुस्सा गुस्सा म ओकर हिसाब-किताब घलो कर दिस। का करे बिचारा बइठमल के आंखी ले चिंता के आंसू ह तरतर-तरतर गिरे बर धर लीस। रोवत-रोवत गरीब ह दरबार ले घर जाए बर निकल गे। एकर सिवा तो कोनो अउ चारा नइ रीहिस हे। बइठमल के व्याकुल दशा ल ओरख के रानी ह धरा पसरा राजा करा जा के कथे-बइठमल ल काबर खिसिया देव जोड़ी? दरबार ल नइ सफ्फा करीस तेकर कारण मंय हंव। गलती तो मंय करे हंव राजा जी, जउन भी डाड़ लेना हे मोर ले लेव मोर गलती के सजा बइठमल ल काबर देवत हव। रानी ल अपन सांखी तीरत ...

महिलाओं हेतु सुखमय जीवन के तीन मूल मंत्र

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*महिलाओं हेतु सुखमय दाम्पत्य जीवन पाने के तीन मूल मंत्र...* महिलाएं अपने दाम्पत्य जीवन मे दुख,समस्याओं या कष्ट भरे जीवन महसूस करते है,जिनके घर क्लेश आते-जाते रहते है उन महिलाओं को ये तीन साधन को अवश्य साध लेना चाहिए जिनसे उनका दाम्पत्य जीवन अवश्य सुखमय हो सकता है- *पहला मर्यादा रूपी सीमा के अंदर रहना।* मर्यादा भंगता का परिणाम हम सभी सूर्पनखा की दशा को याद कर जान सकते है। कहा अपना घर,देश की सीमा को लांघ कर दुसरे के घर,परिवार या ये कहे कि परवेश मे प्रवेश करने की मात्र कोशिश ने उनको ये परिणाम दिया। परिणाम संक्षिप्त मे कहे तो अपना नाम नक कटी और  भईखई धरा लिया भाई (मायके)के कुल की समाप्ति । *दुसरा सुसंस्कार रूपी साधन(धरण) को धारण कर लेना।* ये संस्कार ही है जिनके कारण चरित्र की बखान होती है,चाहे वह सुसंस्कार हो या कुसंस्कार। भारत देश को अन्य देश संस्कार के कारण पूजते है,विश्व गुरू मानते है। वनवास काल मे अत्रि ऋषि ऋग्वेद के पंचम मंडल के द्रष्टा के द्वारा भगवान राम संस्कार लेना तथा अत्रि ऋषि पत्नी अनुसूइया, जो दक्ष प्रजापति की चौबीस कन्याओं में से एक थी उनके द्वारा माता जानकी को बताये गये ...