जीवन का एक रहस्य
जीव, विशेष कर मनुष्यों के लिए यह शरीर एक सिक्का है। परमात्मा टकसाल है जहाँ प्रत्येक जीव के लिए शरीर एक मापदंड मे निर्माण करता है।
जीव सिक्का रूपी तन पाकर इस संसार मे चलता है। वह सिक्का एक हाथ से दुसरे हाथ घुमते रहता है अर्थात् यह सिक्का रूपी तन संसार मे भटकते रहता है।
मोह,माया,काम,क्रोध,मद,लोभ व ईर्ष्या ये अलग अलग व्यवसाय है। सिक्का एक ही है परन्तु इन अलग-अलग व्यवसाय मे भिन्न-भिन्न स्थानो मे भटकते रहता है। अर्थात् यह शरीर कभी मोह के कारण तो कभी माया तो कभी लोभ...के कारण भटकते रहता हैं।
जिस प्रकार सिक्का खजाना या तिजोरी मे कभी चित तो कभी पट (सिक्के का दो पहलू) की अवस्था मे पड़े रहता है या कुछ समय तक वह चित और कुछ समय पट की अवस्था मे तिजोरी मे रहता है और यही प्रक्रिया उनके स्थान बदलने पर होते रहती है।
ठीक उसी प्रकार इस शरीर को इस संसार मे या सूक्ष्म रूप मे कहे तो परिवार मे चित की अवस्था मे सुख और पट की अवस्था मे दु:ख की प्राप्ति होते रहती है और यही परिवर्तन इस संसार का नियम है। इस शरीर को निरंतर न तो सुख प्राप्त होते रहता है और न ही निरंतर दु:ख। ठीक सिक्के की अवस्था मे परिवर्तन की तरह इस शरीर मे सुख और दु:ख आते जाते रहती है।
इसलिए मनुष्यों को दु:ख आने पर शोक या चिंता नही करनी चाहिए क्योंकि यह परिवर्तनशील है और न ही कभी निरंतर सुख की इच्छा रखनी चाहिए। ये जो इच्छा होती है वही मनुष्य को चिंता मे डाल देती है जो शारीरिक एवं मानसिक ह्रास का कारण बनता है। इसलिए मनुष्य अपने को सिक्का समझकर संसार के ये व्यवसाय काम,क्रोध,मद,लोभ,मोह व माया का ज्ञान होना और इस पर संयम रखना चाहिए।
जो मनुष्य इस सिक्के के खेल को समझ जाता है वह परमात्मा के खेल को समझ जाता है और वह जीवन की इन अवस्थाओं से भयमुक्त रहता है उन्हे सुख मे खुशी और दु:ख मे पश्चाताप नही होता है और यही मोक्ष की प्रथम सीढ़ी है।
सुख प्राप्ति के संदर्भ मे कबीरदास जी ने एक अच्छा दोहा लिखे है-
गो-धन, गज-धन,वाजि-धन और रतन-धन खान।
जब आवत संतोष-धन, सब धन धूरि समान।।
संसार के ये सभी धन को प्राप्त कर जो सुख प्राप्त नही होता वह संतोष रूपी धन से प्राप्त होता है। संतोष रूपी धन के समक्ष ये सभी धूरि के समान है जिनकी आवश्यकता ही नही पड़ती है।
पवन नेताम 'श्रीबासु'
सिल्हाटी, स/लोहारा,कबीरधाम (छ.ग.)
दिनांक-13/06/2022
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