खूं के आँसू मुझको रूलाया न कर
खूं के आँसू मुझे रूलाया न कर। इस तरह मुझे याद आया न कर। सामने मेरे डोली तेरी उठने लगी, इस तरह अर्थी मेरी उठाया न कर! जमाने से दाश्ता हमारी मिट जायेगी, इस तरह खत को जलाया न कर! राह मे तेरी फूल हम बिछाते रहे, तू कांटे बिछाकर बुलाया न कर! दर्दे गम की तू मुझको दरिया दे गई, इस तरह तड़पा मुसकुराया न कर! बेखुदी की हद खुद पार कर गई, बेवफा कहके मुझे बुलाया न कर। पवन नेताम 'श्रीबासु' सिल्हाटी, कबीरधाम (छग)