मुक्तक (चित्र)


इंसा मे अब धैर्य कहा, चंद दुख भी रूला जाते है।
आये कही कटिले राह तो, पैर लड़खड़ा जाते है।
सुख और दुख तो प्रकृति का नेह-नियम है पवन,
अपनो से टूटकर देखो, पत्ते भी मुस्कुरा जाते है।

           पवन नेताम "श्रीबासु"
सिल्हाटी, स/लोहारा, कबीरधाम

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