मुक्तक
लगा प्रेम रोग दवाखाना मुझको देदे।
किया जो प्यार हरजाना मुझको देदे।
एक दो जाम से मेरी भला क्या होगा,
मय नही पूरी मयखाना मुझको देदे।
ठोकरों से संभलना हमें आ गया।
अवसरो मे बदलना हमे आ गया।
शमा डूब जाती है जिन अंधेरो मे,
उन अंधेरो मे जलना हमे आ गया।
जो दु:खो को सहकर हरदम मुस्काता है!
दर्द-ए-तूफां मे भी जो तलवार चलाता है!
कारवां तो बहुत है इस जमाने मे 'पवन',
इंसान वही जो दुसरो के दर्द अपनाता है!
खा रहे हो नमक तो अदा कीजिए!
इश्के महोब्बत मे तो वफा कीजिए!
इस दिल ने जख़म बहुत ही खाया है ,
अब हमसे न कोई दगा कीजिए!
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पवन नेताम सिल्हाटी
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