कविता

का करंव कहाँ जांव ,
काला पियंव काला खांव ।
काला मारंव काला काटंव ,
काला चिरंव काला सीलंव ।
कता मॅ भागंव ,
सोवंव के जागंव ।
ये जग ह जंजाल होगे .
जीव बर ये काल होगे  ।
माया ह जाल होगे .
काया अस्पताल होगे ।
मन ह बिमार होगे .
पिरित बुखार होगे ।
संगी के बोली बर कान ह मोर  तरसे .
नैना ह दरस खातिर भादो कस बरसे ।
हिरदे के अंगना म चिरईय्या�
चहके ,
सुरता के खुशबु म तन मन ह
महके ।
का होगे संगी मोर कईसे रिसागे ,
मया के बगिया ले फुर्र ले उडागे ।
मने मन मा गुनत हंव कईसे वोहा होही .
का मोर सुरता करके ओहू रोवत होही ।
बनके देंह गिरा गिरगेंव ओखर नजर ले ,
बोली मोर लगे वोला बढके
जहर ले ।
राम जाने कब ओखर दरस कहाँ पाहूं  ,
हिरदे के आगी अपन कईसे के बुताहूँ ।
करम ह फुटहा हे मनहा मोर टुटहा हे .
मया के खीर मोर सिठ्ठा पनछुटहा हे ।
मत बन तै भैरी बैरी सुनले मोर गोहार .
तन लोहा तीपे भठ्ठी मे पिटे घन मे लोहार ।

फन्नू बैरागी
बंदौरा, कबीरधाम

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