नारी
मैं रही राधा,रही मीरा,कभी सीता रही मैं रुक्मणी भी,उर्मिला भी मैं,अहिल्या भी रही हूँ युग रहा कोई,कहानी जो रही हो मैं अधूरे प्यार से पूरी हुई हूँ ! मैं उपेक्षित रह गयी हूँ लक्ष्मण के वनगमन में इंद्र के छल से बंधी मैं युगों तक पाषाण तन में राजमहलों का ज़हर भी पी चुकी हूँ बन के जोगन द्वारिकाधीषों ने तोड़ा है निठुरता से सरल मन पात्र सारे जी चुकी हूँ इसलिए आसान था यह इन सभी की वेदना के सार से पूरी हुई हूँ ! सूर्यपुत्रों को स्वयं जलकर परीक्षा दे चुकी हूँ बाल्मीकी आश्रमों को जन्मदीक्षा दे चुकी हूँ स्वर्ण लंका की विजय जिनकी कहानी कह गयी है उन्ही से यह प्रेम की पुस्तक अजानी रह गयी है पालती हूँ लवकुशों को आचरण के आँचलों से पर अवध की विकल सरयू धार से पूरी हुई हूँ ! मोम से मन को बनाया है स्वयं चट्टान मैंने छीन कर यमदूत से वापस लिया है प्राण मैंने प्यार से अपने दृगों पर स्वयं पट्टी धर चुकी हूँ रक्त से ये केश धोने की प्रतिज्ञा कर चुकी हूँ हस्तिनापुर की सभा में मौन बैठे हर विदुर की भीष्म की और कौ...