पत्थर का देवता
पत्थर का देवता !
(व्यंग्य)
मैं नास्तिक हूँ
फिर भी पत्थर के देवता को मानता हूँ
क्योंकि वह-
अगर किसी का बनाता नही
तो,किसी का बिगाड़ता भी नही !
वह चुप रहता है
अपनी जगह अडिग रहता है
न चमत्कारों का विज्ञापन करता है
न आशीर्वादों की दुकान खोलता है !
पर कुछ जीवित बाबा
कथित साधु-संत महान-
जितना बनाते नहीं
उससे कहीं अधिक बिगाड़ देते हैं !
वे श्रद्धा को सीढ़ी बनाते हैं
और भोलेपन को व्यापार,
भक्ति को बाज़ार में तौलते हैं,
आस्था पर मूल्य-टैग लगाते हैं !
पत्थर का देवता कम से कम
भावनाओं से खेलता तो नहीं,
वह चुपचाप पूजित रहता है,
पर किसी का विवेक नहीं लूटता !
इसीलिए मैं उसे मानता हूँ--
जो निष्प्राण होकर भी निर्दोष है,
उनसे बेहतर
जो जीवित होकर भी संवेदनाएँ
बंधक बना लेते हैं !
मैं नास्तिक हूँ--
पर इतना आस्तिक अवश्य हूँ,
कि इंसान को इंसान रहने दूँ,
देवता बनाकर
उसका धंधा न करूँ !
~ राजकुमार 'मसखरे'
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