वहसी दरिंदो का ऐसा अंजाम होना चाहिए
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वहशी दरिंदो का, ऐसा इंतजाम होना चाहिए ।
सोचने पर ही काँप उठे, ऐसा अंजाम होना चाहिए ।।
दो मासूम बच्चों पर, वहशी बनकर झपट पड़े ।
क्रंदन सुनकर शेष दरिंदे, रहे देखते खड़े खड़ें।
ऐसें दरिंदो की इज्ज़त, नीलाम होना चाहिए,
सोचने पर ही काँप उठे, ऐसा अंजाम होना चाहिए।
रूदन,क्रंदन और पीड़ा से, ह्रदय नही क्यों अकुलाये ?
मानवता सब भुल गये, तुम पशुता लेकर आये ?
संहार करो इन पशुओं का, दूजे को पैगाम होना चाहिए,
सोचने पर ही काँप उठे, ऐसा अंजाम होना चाहिए।
देह नोचने वाले तुम तो, मर्यादा सब भूल गए ।
माँ की ममता, बहन की राखी, रिश्ते सारे भूल गए ।।
हवस के लूटेरों का, न सुबह न ही शाम होना चाहिए
सोचने पर ही काँप उठे, ऐसा अंजाम होना चाहिए ।
राखी जैसे पावन पर्व पर भाई कोई न बन सकें।
द्रोपदी की चीर बचाने कोई कन्हाई न बन सकें।
दुशासन की इन टोली की बेइज्ज़ती, सरेआम होना चाहिए
अब सोचने पर भी काँप उठे ऐसा अंजाम होना चाहिए।
-- पवन नेताम 'श्रीबासु'
सिल्हाटी, कबीरधाम (छ.ग.)
05.09 2023
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