रात को तकिया भींगा भींगा कर
तुम्हारी यादो मे तड़प रहे हम रात को तकिया भींगा भींगा कर।
देखे थे जो हमनें साथ सपने उन सपनों को सजा सजा कर।
नयी थी चाहत नयी थी उल्फत हम दो प्रेमी नये नये थे,
जब वो मुझसे बाते करती अपनी नज़रे झुका झुका कर।
प्यार मे अंधे हमी थे पागल गूंगा जुबां हम जो थे रखते,
बेवफाई कर पिघला डाला एक सोने को तपा तपा कर।
दिल मे है यादें बदन पे जख़्म और कोई निशानी नही है तेरी,
वो फेकें अंगूठी हम ढूंढ डाले पानी से रेत हटा हटा कर।
बेवफा नाम तेरा कातिल चेहरा लेके चले जमाने डगर पे,
हर शहर से पता पूछते तुम्हारी तस्वीर दिखा दिखा कर।
जिंदगी टुट के बिखर रही हैं हादसा कहिए या फिर तमाशा,
मीन को मारे बिन पानी के हमी को अश़्क मे डूबा डूबा कर।
पवन नेताम 'श्रीबासु'
सिल्हाटी,कबीरधाम (छ.ग.)
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