मोर बरनन

कोट मा जोरदार दिखथस,
गजब लिखथस,बोलथस।

सुन के कविता मुचमुचाथे,
दिल के बात ल खोलथस।

दिल के सुग्घर नेताम कवि,
मन के जाली मा झोलथस।

पवन ल कहिथे जम्मो हवा,
सिरतोन मा तैहर डोलथस।

पवन,गर्रा,हवा कतको नाम,
कविता,धार  मा छोलथस।

विचार हवे तोर अबड़ निक,
कविता मा भाव टटोलथस।

मंच मा हबर के धर माइक,
मोहब्बत, गजल तोलथस।

*राज किशोर धिरही भैया*

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