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नारी

मैं रही राधा,रही मीरा,कभी सीता रही मैं  रुक्मणी भी,उर्मिला भी मैं,अहिल्या भी रही हूँ  युग रहा कोई,कहानी जो रही हो  मैं अधूरे प्यार से पूरी हुई हूँ ! मैं उपेक्षित रह गयी हूँ लक्ष्मण के वनगमन में  इंद्र के छल से बंधी मैं युगों तक पाषाण तन में  राजमहलों का ज़हर भी पी चुकी हूँ बन के जोगन  द्वारिकाधीषों ने तोड़ा है निठुरता से सरल मन पात्र सारे जी चुकी हूँ इसलिए आसान था यह  इन सभी की वेदना के सार से पूरी हुई हूँ ! सूर्यपुत्रों को स्वयं जलकर परीक्षा दे चुकी हूँ  बाल्मीकी आश्रमों को जन्मदीक्षा दे चुकी हूँ  स्वर्ण लंका की विजय जिनकी कहानी कह गयी है  उन्ही से यह प्रेम की पुस्तक अजानी रह गयी है  पालती हूँ लवकुशों को आचरण के आँचलों से  पर अवध की विकल सरयू धार से पूरी हुई हूँ !  मोम से मन को बनाया है स्वयं चट्टान मैंने  छीन कर यमदूत से वापस लिया है प्राण मैंने  प्यार से अपने दृगों पर स्वयं पट्टी धर चुकी हूँ  रक्त से ये केश धोने की प्रतिज्ञा कर चुकी हूँ  हस्तिनापुर की सभा में मौन बैठे हर विदुर की  भीष्म की और कौ...

पत्थर का देवता

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पत्थर का देवता !       (व्यंग्य) मैं नास्तिक हूँ फिर भी पत्थर के देवता को मानता हूँ  क्योंकि वह- अगर किसी का बनाता नही  तो,किसी का बिगाड़ता भी नही ! वह चुप रहता है अपनी जगह अडिग रहता है न चमत्कारों का विज्ञापन करता है न आशीर्वादों की दुकान खोलता है ! पर कुछ जीवित बाबा कथित साधु-संत महान- जितना बनाते नहीं उससे कहीं अधिक बिगाड़ देते हैं ! वे श्रद्धा को सीढ़ी बनाते हैं और भोलेपन को व्यापार, भक्ति को बाज़ार में तौलते हैं, आस्था पर मूल्य-टैग लगाते हैं ! पत्थर का देवता कम से कम भावनाओं से खेलता तो नहीं, वह चुपचाप पूजित रहता है, पर किसी का विवेक नहीं लूटता ! इसीलिए मैं उसे मानता हूँ-- जो निष्प्राण होकर भी निर्दोष है, उनसे बेहतर जो जीवित होकर भी संवेदनाएँ बंधक बना लेते हैं ! मैं नास्तिक हूँ-- पर इतना आस्तिक अवश्य हूँ, कि इंसान को इंसान रहने दूँ, देवता बनाकर उसका धंधा न करूँ !          ~ राजकुमार 'मसखरे'

हिन्दी दिवस पर कविता

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हिन्दी पढ़ें,हिन्दी लिखें, हिन्दी ही नित बोलें ।  मन की अपनी भावना को, शब्दों में पिरो लें ।  राज-काज सम्पर्क की, यही है भाषा-बोली, कर के साहित्य-सृजन,गठरी चितवन की खोलें ।   है मातृभाषा हमारी ,यह जननी के समान,   गरिमा को इसकी,विदेशी भाषा से न तौलें ।  देती है यह संदेश, प्रेम और सद्भाव का,  सुषुप्त चेतना ,चोट कर धड़कन को टटोलें ।  करें पराजित दुश्मन को, वाद में शब्द बाणों से, आन्दोलनों में भी हुँकार भर वीर- रस घोलें । सीखें और करें सम्मान, सभी भाषाओं का, पर हिन्दी -भाषा बोलने से, कभी न मन डोलें । बहुत-बहुत शुभकामना हिन्दी-दिवस पर सबको, मन वचन कर्म से ‘दशरथ’,बस हिन्दी के ही हो लें।          दशरथ सिंह भुवाल  सोनपांडर, भिलाई छत्तीसगढ़