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कन्हैया का जादू डारे

ऐ रे कन्हैया का जादू डारे,मोला कुछु अब नइ तो सुहाथे। तै नइ जाने कतको नजर उतारेव, आँसू आँखी ले नइ तो सुखाथे..ऐ रे कन्हैया।... नजर उतारेव, डीठ मै डारेव। चिर-चिर लिमवा,मुड़ ले उतारेव। कतको गुनिया मंतर मारे -2 तभो ले पार नइ तो पाथे..... कतका सुघ्घर भोजन बनायेव, कतका कतका काला डारेव। अम्मटहा कढ़ही न मीठा पकवान-2 मोला कुछु ह समझ नइ आथे... नइ जानव कइसे दिन ह पहाथे, मन मतंगा तोर कोती जाथे। तोर बंशी के धुन रे छलिया-2 मोर हिरदे ल हिलोर जाथे.... आखिरी कारण का निकलिस आंखिर नजर,जादू कहा ले लगे हे गीत मे नही भाव म ध्यान देना ये जो हल्का हल्का शुरूरूर है ये जो पागलपन सा शुरूरूर है ये जो ... ये तो तेरे नजर का कुसुर है..             पवन नेताम 'श्रीबासु'        सिल्हाटी,कबीरधाम (छ.ग.)

महिलाओं के सुख का मूल मंत्र

*महिलाओं हेतु सुखमय दाम्पत्य जीवन पाने के तीन मूल मंत्र...* महिलाएं अपने दाम्पत्य जीवन मे दुख,समस्याओं या कष्ट भरे जीवन महसूस करते है,जिनके घर क्लेश आते-जाते रहते है उन महिलाओं को ये तीन साधन को अवश्य साध लेना चाहिए जिनसे उनका दाम्पत्य जीवन अवश्य सुखमय हो सकता है- *पहला मर्यादा रूपी सीमा के अंदर रहना।* मर्यादा भंगता का परिणाम हम सभी सूर्पनखा की दशा को याद कर जान सकते है। कहा अपना घर,देश की सीमा को लांघ कर दुसरे के घर,परिवार या ये कहे कि परवेश मे प्रवेश करने की मात्र कोशिश ने उनको ये परिणाम दिया। परिणाम संक्षिप्त मे कहे तो अपना नाम नक कटी और  भईखई धरा लिया भाई (मायके)के कुल की समाप्ति । *दुसरा सुसंस्कार रूपी साधन(धरण) को धारण कर लेना।* ये संस्कार ही है जिनके कारण चरित्र की बखान होती है,चाहे वह सुसंस्कार हो या कुसंस्कार। भारत देश को अन्य देश संस्कार के कारण पूजते है,विश्व गुरू मानते है। वनवास काल मे अत्रि ऋषि ऋग्वेद के पंचम मंडल के द्रष्टा के द्वारा भगवान राम संस्कार लेना तथा अत्रि ऋषि पत्नी अनुसूइया, जो दक्ष प्रजापति की चौबीस कन्याओं में से एक थी उनके द्वारा माता जानकी को बताये...

सुख और संतोष

*जीव, विशेष कर मनुष्यों के लिए यह शरीर एक सिक्का है। परमात्मा टकसाल है जहाँ प्रत्येक जीव के लिए शरीर एक मापदंड मे निर्माण करता है।*                 जीव सिक्का रूपी तन पाकर इस संसार मे चलता है। वह सिक्का एक हाथ से दुसरे हाथ घुमते रहता है अर्थात् यह सिक्का रूपी तन संसार मे भटकते रहता है।      *मोह,माया,काम,क्रोध,मद,लोभ व ईर्ष्या ये अलग अलग व्यवसाय है। सिक्का एक ही है परन्तु इन अलग-अलग व्यवसाय मे भिन्न-भिन्न स्थानो मे भटकते रहता है। अर्थात् यह शरीर कभी मोह के कारण तो कभी माया तो कभी लोभ...के कारण भटकते रहता हैं।*       *जिस प्रकार सिक्का खजाना या तिजोरी मे कभी चित तो कभी पट (सिक्के का दो पहलू) की अवस्था मे पड़े रहता है या कुछ समय तक वह चित और कुछ समय पट की अवस्था मे तिजोरी मे रहता है और यही प्रक्रिया उनके स्थान बदलने पर होते रहती है।*       ठीक उसी प्रकार इस शरीर को इस संसार मे या सूक्ष्म रूप मे कहे तो परिवार मे चित की अवस्था मे सुख और पट की अवस्था मे दु:ख की प्राप्ति होते रहती है और यही परिवर्तन इस संसार क...

मुक्तक

.नया पाने की चाहत मे पुराना छुट जाता है। तुझे अपनाऊ तो मुझसे जमाना रूठ जाता है। मोहब्बत पढने लिखने मे आसान है दोस्तो मोहब्बत को निभाने मे पसीना छुट जाता है। दिल के बातों को नज़रों से किया करतें है। उस शबनम को  आँखो से  पिया करते है। इश्क मोहब्बत की जिसको भी है नज़र जो लगी, बंद आँखो मे भी उन्हे देख लिया करते हैं। मोहाबत की गलियों मे जां निसार कर ले। मिले ढंग कोई लड़की तो इजहार कर ले। हो जायेंगी शादी तेरी फिर होगी पछतावा, अभी उमर है तेरी काचा जा तू प्यार कर ले। मजा है कितना प्यार मे आजमा के देख ले। बैठा के बुलेट मे लड़की तू घुमा के देख ले।  सहन शक्ति तुझमे कितना ये कैसे जानेगा, उनके भाइयों के मार तू अब खा के देख ले। झुका मत नजरे तू दुनिया उड़ान देखता है। हिंदू है तो प्रार्थना मुस्लिम अजान देखता है। इंसा है तो इंसानियत का थोड़ा रखले जिगर, क्यो गला काटने गरीब का मकान देखता है। तुम्हारा रूठना तड़प से कम नही। जह़र दे दो यार पर ये सितम नही। इश़्क के  कहर  बहुत सहे है  पर, तुम्हारे रूठने जैसा कोई गम नही।                 पवन नेताम 'श...

वहसी दरिंदो का ऐसा अंजाम होना चाहिए

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समाचार पत्र भी पेश है  वहशी दरिंदो का, ऐसा इंतजाम होना चाहिए । सोचने पर ही काँप उठे, ऐसा अंजाम होना चाहिए ।। दो मासूम बच्चों पर, वहशी बनकर झपट पड़े । क्रंदन सुनकर शेष दरिंदे, रहे देखते खड़े खड़ें। ऐसें दरिंदो की इज्ज़त, नीलाम होना चाहिए, सोचने पर ही काँप उठे, ऐसा अंजाम होना चाहिए। रूदन,क्रंदन और पीड़ा से, ह्रदय नही क्यों अकुलाये  ? मानवता सब भुल गये, तुम पशुता लेकर आये  ? संहार करो इन पशुओं का, दूजे को पैगाम होना चाहिए, सोचने पर ही काँप उठे, ऐसा अंजाम होना चाहिए। देह नोचने वाले तुम तो, मर्यादा सब भूल गए  । माँ की ममता, बहन की राखी, रिश्ते सारे भूल गए  ।। हवस के लूटेरों का, न सुबह न ही शाम होना चाहिए सोचने पर ही काँप उठे, ऐसा अंजाम होना चाहिए । राखी जैसे पावन पर्व पर भाई कोई न बन सकें। द्रोपदी की चीर बचाने कोई कन्हाई न बन सकें। दुशासन की इन टोली की बेइज्ज़ती, सरेआम होना चाहिए  अब सोचने पर भी काँप उठे ऐसा अंजाम होना चाहिए।         --  पवन नेताम 'श्रीबासु'        सिल्हाटी, कबीरधाम (छ.ग.)       ...