कन्हैया का जादू डारे
ऐ रे कन्हैया का जादू डारे,मोला कुछु अब नइ तो सुहाथे। तै नइ जाने कतको नजर उतारेव, आँसू आँखी ले नइ तो सुखाथे..ऐ रे कन्हैया।... नजर उतारेव, डीठ मै डारेव। चिर-चिर लिमवा,मुड़ ले उतारेव। कतको गुनिया मंतर मारे -2 तभो ले पार नइ तो पाथे..... कतका सुघ्घर भोजन बनायेव, कतका कतका काला डारेव। अम्मटहा कढ़ही न मीठा पकवान-2 मोला कुछु ह समझ नइ आथे... नइ जानव कइसे दिन ह पहाथे, मन मतंगा तोर कोती जाथे। तोर बंशी के धुन रे छलिया-2 मोर हिरदे ल हिलोर जाथे.... आखिरी कारण का निकलिस आंखिर नजर,जादू कहा ले लगे हे गीत मे नही भाव म ध्यान देना ये जो हल्का हल्का शुरूरूर है ये जो पागलपन सा शुरूरूर है ये जो ... ये तो तेरे नजर का कुसुर है.. पवन नेताम 'श्रीबासु' सिल्हाटी,कबीरधाम (छ.ग.)