सरद ऋतु


सुघर चहकत हे चिरई -चिरगुन।
सरद ऋतु आगे मन होगे बिधुन।


बरसा देथे जब आँखी मूंद।
गिरथे अमरित ओस के बूंद।
हिलोर जाथे हिरदे मिलथे सुकून..


अनपूरना ह हरियर होगे।
चंदा ह घलो फरियर होगे।
तब गावय किसान ददरिया के धुन..


पुरइन के सुघर फूल-पाना।
सरद ऋतु के हरय अगुवाना।
मंडरावय भौंरा संग मधुर गुनगुन..


जइसे महत्ता हे साग म नून।
धरम करम जिनगी म पून।
मनखे अस त मोर बात ल गुन..

सरद ऋतु आगे मन होगे बिधुन।


   पवन नेताम "श्रीबासु"
 सिल्हाटी, स/लोहारा,कबीरधाम(छ.ग.)


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

तुलसी विवाह

किसान और टमाटर