पहली होली के दुख

...........पहली होली के दुख...........

करेव बिहाव कुवारा दुख जान के,
सुवारी लायेव दाई-ददा के बात मान के।
त का होगे,
अरे का जादू डार दिए सुरता भुलावत नइ हे..
मइके चलदिस सुवारी ह आवत नइ हे।

नाचत लाये रेहेव बाजा अऊ डोली म,
भेजे ल परगे समारू पहली होली म।
अंगना ल करके चलदिस जी सुन्ना,
भीतरे भीतर होगे संगी मोला गुन्ना।
त का होवत हे,
अरे रतिहा कन दसना मोला भावत नइ हे
मइके चलदिस सुवारी ह आवत नइ हे।

हँस्ती सूरत ह मोर खोइला कस चपट गे,
होली मोर बर संगी गिरहा बन झपट गे।
दौड़े दौड़े सुर ह ओखरे डाहर जावय,
न नींद आवय रतिहा न दिन ह पहावय।
त दाई कहाये,
ऐ रोगहा टुरा एको कौरा खावत नइ हे...
मइके चलदिस सुवारी ह आवत नइ हे।

मिरगिन कस रेंगना,कोयली कस हे बोली,
घेरी-बेरी सुरता आवय हाँसी ठिठोली।
सुवा पाखी लुगरा मोंगरा खोपा म लगावय,
रूप सुन्दरी निकलय त चंदा घलो लजावय।
त का दशा हे,
गोसइन के मया ल पवन अभी पावत नइ हे..
मइके चलदिस सुवारी ह आवत नइ हे।

                 पवन नेताम "श्रीबासु"
         सिल्हाटी, स/लोहारा, कबीरधाम
                मोबा- 9098766347

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