मुक्तक

किया था ईजहार प्यार पाने को,
मिलाया यूँ नजर दिल सजाने को।
पता न था हश्र इस मोहब्बत का,
की दिल को लगाया सजा पाने को।

सफर के बाद साथ छूटना ही था
शीशा था एक दिन टूटना ही था
इश्क तो किया था बड़ी लज्जत से
मुस्कुराने के बाद रूठना ही था
       पवन  नेताम "श्रीबासु"

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