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पोरा पटकना

पोरा पटकना पोरा तिहार के एक अऊ अंग जेन ल पोरा तिहार के संझा बेरा मनायें जाथे। जेन ल पोरा पटकना कहिथे। पोरा पटके के दू कारन सुने ल मिलथे ।  जेमा पहली धार्मिक कारन हे,                 द्वापर जुग म पोरासुर नाम के राक्षस रिहिस जेन ल भगवान कन्हैया ह गांव के मेड़ों म पटक-पटक के मारे रिहिस तेखर सेती आज ले पोरा ल पटक के तिहार ल मनाये जाथे।           पोरासुर ल कन्हैया द्वारा पटके गिस,गांव ले भगाये गिस त पोरासुर कहिस प्रभु भाग तो जहुं पर मैं खाहू-पीहू काला ? त कन्हैया द्वारा कहे गिस कि तै खेत-खार के किट पतंगा ल खाबे अऊ मेड़ो के भीतरी घुसन झन देबे‌। दूसर गोठ लोक मान्यता सुने ल मिलथे कि पोरा म ठेठरी-खुरमी ल भरके गांव के मेड़ों म पटके जाथे।           एखर संदर्भ कहिथे कि हमर फसल के नाश करइयां ल खाथे तेखर सेती शुरूआत म ठेठरी-खुरमी ले मुंह मीठा कराये जाथे तहां ले फसल के कटत ले किट पतंगा मन ल खावत राहय।                 कुल मिलाके ए मान्यता के पाछू भाव हे कि गांव अऊ ...

पोरा या पोला..?

पोरा या पोला..? *भैया सुशील भोले के कलम ले*✍️✍️✍️       आजकाल ए देखे म जादा आवत हे, के हमर इहाँ के लोगन अपन परंपरा-संस्कृति के मूल स्वरूप ल जाने-समझे ल छोड़ के पर के पाछू भेड़िया धसान बरोबर किंजरई ल जादा गरब के मान डरथें.     अभी बीते दिन कमरछठ परब ल देखे रेहेन, लोगन उत्तर भारत ले आए लोगन मन के देखासिखी एला हलषष्ठी बतावत बलराम जयंती काहत रिहिन हें. एदे अब अवइया 'पोरा' परब के संबंध म घलो अइसने देखे जावत हे. पोरा ल हिंदीकरण करत 'पोला' कहे जावत हे, सोशलमीडिया के ठीहा तो अंखमूंदा मन के बसेरा बनगे हवय.       असल म हमर छत्तीसगढ़ म मनाए जाने वाला परब ह 'पोरा' आय. छत्तीसगढ़ी भाखा म पोला शब्द छेदा, भोंगरा या पोलपोला खातिर उपयोग करे जाथे. जबकि हमर इहाँ पोरा के परब मनाए जाथे, वो ह धान म पोर फूटना, पोटरी या पोठरी पान धरे के अवस्था, जेला गर्भधारण के अवस्था कहे जाथे, तेकर सेती मनाए जाथे. एकरे सेती ए दिन किसान मन अपन अपन खेत म पोरा म रोटी पीठा चढ़ाथें, जे ह धान के फसल ल गर्भधारण करे के सेती सधौरी खवाए के प्रतीक स्वरूप होथे. जइसे हम अपन बेटी-माई मनला प...