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जीवन का एक रहस्य

जीव, विशेष कर मनुष्यों के लिए यह शरीर एक सिक्का है। परमात्मा टकसाल है जहाँ प्रत्येक जीव के लिए शरीर एक मापदंड मे निर्माण करता है।                 जीव सिक्का रूपी तन पाकर इस संसार मे चलता है। वह सिक्का एक हाथ से दुसरे हाथ घुमते रहता है अर्थात् यह सिक्का रूपी तन संसार मे भटकते रहता है।      मोह,माया,काम,क्रोध,मद,लोभ व ईर्ष्या ये अलग अलग व्यवसाय है। सिक्का एक ही है परन्तु इन अलग-अलग व्यवसाय मे भिन्न-भिन्न स्थानो मे भटकते रहता है। अर्थात् यह शरीर कभी मोह के कारण तो कभी माया तो कभी लोभ...के कारण भटकते रहता हैं।       जिस प्रकार सिक्का खजाना या तिजोरी मे कभी चित तो कभी पट (सिक्के का दो पहलू) की अवस्था मे पड़े रहता है या कुछ समय तक वह चित और कुछ समय पट की अवस्था मे तिजोरी मे रहता है और यही प्रक्रिया उनके स्थान बदलने पर होते रहती है।       ठीक उसी प्रकार इस शरीर को इस संसार मे या सूक्ष्म रूप मे कहे तो परिवार मे चित की अवस्था मे सुख और पट की अवस्था मे दु:ख की प्राप्ति होते रहती है और यही परिवर्तन इस संसार का नियम...

भलाई

एक रेस्टोरेंट में कई बार देखा गया  कि, एक व्यक्ति (भिखारी) आता है और भीड़ का लाभ उठाकर नाश्ता कर चुपके से बिना पैसे, दिए निकल जाता है। एक दिन जब वह खा रहा था तो एक आदमी ने चुपके से दुकान के मालिक को बताया कि यह भाई भीड़ का लाभ उठाएगा और बिना बिल चुकाए निकल जाएगा। उसकी बात सुनकर रेस्टोरेंट का मालिक मुस्कराते हुए बोला – उसे बिना कुछ कहे जाने दो, हम इसके बारे में बाद में बात करेंगे। हमेशा की तरह भाई ने नाश्ता करके इधर-उधर देखा और भीड़ का लाभ उठाकर चुपचाप चला गया। उसके जाने के बाद, उसने रेस्टोरेंट के मालिक से पूछा कि मुझे बताओ कि आपने उस व्यक्ति को क्यों जाने दिया। रेस्टोरेंट के मालिक ने कहा आप अकेले नहीं हो, कई भाइयों ने उसे देखा है और मुझे उसके बारे में बताया है। वह रेस्टोरेंट के सामने बैठता है और जब देखता है कि भीड़ है, तो वह चुपके से खाना खा लेता है। मैंने हमेशा इसे नज़रअंदाज़ किया और कभी उसे रोका नहीं, उसे कभी पकड़ा नहीं और ना ही कभी उसका अपमान करने की कोशिश की.. क्योंकि मुझे लगता है कि मेरी दुकान में भीड़ इस भाई की प्रार्थना की वजह से है वह मेरे रेस्टोरेंट के सामने बैठे हुए प्रार...