अक्ती तिहार के गोठ...
खेती किसानी के नवा बच्छर अकती तिहार म पुतरी-पुतरा बिहाव के परम्परा - दुर्गा प्रसाद पारकर छत्तीसगढ़ी लोक कथा के मुताबिक बहुत दिन पहिली के बात आय जब रतनपुर के राजा के दरबार म कतको सौंजिया, बइला चरवाहा अउ दरोगा कस कतको कमइया मन सेवा बजाये। कमइया मन के मारे राज दरबार ह भरे-भरे लागे। इहें बइठमल नाव के एक झिन नौकर घलो राहय। निच्चट कोड़िहा राहे बइठमल ह। एकर अलाली ह राजा के आंखी म पहिलीच्च ले खटकत रीहिस हे। उपराहा म एक दिन बइठमल ह दरबार ल बहारे-बटोरे बर बिसर डरिस। दरबार म कचरा ह जतर कतर बगरे राहे। राज दरबार के हालत ल देख के राजा ह बइठमल उपर बिफड़गे। गुस्सा गुस्सा म ओकर हिसाब-किताब घलो कर दिस। का करे बिचारा बइठमल के आंखी ले चिंता के आंसू ह तरतर-तरतर गिरे बर धर लीस। रोवत-रोवत गरीब ह दरबार ले घर जाए बर निकल गे। एकर सिवा तो कोनो अउ चारा नइ रीहिस हे। बइठमल के व्याकुल दशा ल ओरख के रानी ह धरा पसरा राजा करा जा के कथे-बइठमल ल काबर खिसिया देव जोड़ी? दरबार ल नइ सफ्फा करीस तेकर कारण मंय हंव। गलती तो मंय करे हंव राजा जी, जउन भी डाड़ लेना हे मोर ले लेव मोर गलती के सजा बइठमल ल काबर देवत हव। रानी ल अपन सांखी तीरत ...